Wednesday, November 12, 2008

ऊहापोह

हर सुबह की एक शाम होती है ,
अगर धूप होती है तो छाँव भी होती है ,
हर रात के बाद एक सुबह होती है ,
लेकिन ये कैसी रात है , जिसकी सुबह आती ही नही ,
मैंने तो अपनी आखें बंद भी नहीं की , एक सुबह के आने के इंतजार मै ,
अब एसा लगाने लगा है कि, शायद मै पृथ्वी पर हूँ ही नहीं ,
किसी अनदेखे अनजाने ग्रह पर सूरज की रौशनी की तलाश मे भटक रहा हूँ, शायद जिसका कोई सूरज है ही नहीं,
या फ़िर परिवर्तन आ गया है, सूरज पीले रंग को छोड़कर काला हो गया है,
अगर ये सत्य है तो कैसा है ये परिवर्तन, मानव जीवन के विकास के लिए या विनाश के लिए?

1 comment:

रवि रतलामी said...

और, कभी सुबह होती है तो रात होने का नाम नहीं लेती. कभी सुबह शाम बस एक जैसी होती हैं, गुजरते जाती हैं बिना प्रयोजन... ऊहापोह में...

सुंदर कविता.